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लिथुआनिया समाचार - इतिहास




लिथुआनिया समाचार

लिथुआनिया

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समयरेखा: लिथुआनिया

1915 प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सैनिकों द्वारा लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया गया।

1918 - लिथुआनिया ने स्वतंत्रता की घोषणा की।

1920 - सोवियत रूस ने मास्को की संधि के तहत लिथुआनिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी।

1926 - राष्ट्रवादी पार्टी के नेता अंतानास स्मेटोना ने वामपंथी चुनाव जीतने के बाद सैन्य तख्तापलट में सत्ता पर कब्जा कर लिया।

1939 - सोवियत संघ लिथुआनिया को सोवियत सैन्य ठिकानों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है।

1940 - सोवियत सेना ने आक्रमण किया। स्मेटोना भाग जाता है। लिथुआनिया को यूएसएसआर में शामिल किया गया।

1941 - हजारों लिथुआनियाई साइबेरिया में निर्वासित। नाजियों ने यूएसएसआर पर आक्रमण किया और लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया।

1944 - लाल सेना वापस लौटती है, आगे निर्वासन और प्रतिरोध के दमन की भविष्यवाणी करती है।

1988 - लेखकों और बुद्धिजीवियों के समूह ने पुनर्निर्माण के लिए लिथुआनियाई आंदोलन (सजुदी) की स्थापना की। इसके नेताओं ने राजधानी विनियस में एक जन रैली में घोषणा की कि यूएसएसआर ने अवैध रूप से लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया था।

रिंगौदास सोंगैला को लिथुआनियाई कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख के पद से बर्खास्त कर दिया गया। Algirdas Brazauskas द्वारा प्रतिस्थापित।

1989 - संसद ने लिथुआनियाई संप्रभुता की घोषणा को मंजूरी देते हुए कहा कि लिथुआनियाई कानूनों को सोवियत कानूनों पर प्राथमिकता दी जाती है।

लिथुआनियाई कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो गई और स्वतंत्रता के लिए समर्थन की घोषणा की।

स्वतंत्रता संग्राम

1990 - संसदीय चुनावों में साजुदियों ने बहुमत से जीत हासिल की। इसके नेता, व्याटौटास लैंड्सबर्गिस, संसद के अध्यक्ष चुने जाते हैं जो स्वतंत्रता की बहाली की घोषणा करता है।

यूएसएसआर ने प्रतिबंध लगा दिया, ईंधन की आपूर्ति को रोक दिया और गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का कारण बना। लिथुआनिया स्वतंत्रता, लंबित वार्ता को स्थगित करने के लिए सहमत है।

1991 जनवरी - चूंकि मॉस्को के साथ बातचीत में कोई प्रगति नहीं हुई है और अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा है, लैंड्सबर्गिस ने स्वतंत्रता की घोषणा के निलंबन को समाप्त कर दिया।

सोवियत सैनिकों ने विनियस में टेलीविजन टॉवर के बाहर नागरिकों पर गोलीबारी की, जिसमें 13 लोग मारे गए और कई सौ घायल हो गए।

1991 फरवरी - जनमत संग्रह स्वतंत्रता के पक्ष में भारी वोट देखता है।

1991 सितंबर - पिछले महीने मास्को में असफल तख्तापलट के बाद, यूएसएसआर ने लिथुआनिया की स्वतंत्रता को मान्यता दी। लिथुआनिया OSCE और UN में शामिल हुआ।

1992 - नया संविधान राष्ट्रपति पद का परिचय देता है। पूर्व कम्युनिस्ट पार्टी, जिसका नाम बदलकर लिथुआनियाई डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी कर दिया गया, आम चुनाव में साजुदियों की तुलना में अधिक सीटें जीतती है। गठबंधन सरकार बनी।

1993 - ब्राज़ौस्कस राष्ट्रपति चुने गए। लिथुआनिया यूरोप की परिषद में शामिल हुआ। नई राष्ट्रीय मुद्रा, लिटास, पेश की गई। सोवियत सैनिकों की पूर्ण वापसी।

1994 - लिथुआनिया शांति कार्यक्रम के लिए नाटो पार्टनरशिप में शामिल हुआ। पोलैंड के साथ मित्रता की संधि पर हस्ताक्षर किए।

1995 - लिथुआनिया के दो सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंक ढह गए। राजनीतिक घमासान होता है।

1996 - प्रधान मंत्री Slezevicius बैंकिंग संकट के बाद बर्खास्त कर दिया। आम चुनाव केंद्र-दक्षिण गठबंधन सरकार लाते हैं।

1997 - राष्ट्रपति ब्राज़ौस्कस रूस की यात्रा पर हैं। सीमा संधि, सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।

1998 - लगभग 50 साल निर्वासन में बिताने वाले अमेरिकी नागरिक वाल्दास एडमकुस राष्ट्रपति चुने गए।

1999 - अमेरिकी ऊर्जा समूह, विलियम्स इंटरनेशनल को लिथुआनियाई राज्य तेल कंपनी में एक नियंत्रित शेयर बेचने पर विवादास्पद अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। कंजर्वेटिव पीएम रोलैंडस पाकास ने इस्तीफा दिया। एंड्रियस कुबिलियस प्रधान मंत्री बने।

2000 - आम चुनाव एक और केंद्र-दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार लौटाता है। पाकस ने इस बार लिबरल यूनियन के सदस्य के रूप में प्रधान मंत्री को फिर से नियुक्त किया।

2001 जुलाई - निजीकरण और अन्य आर्थिक सुधारों पर विवाद में गठबंधन के पतन के बाद ब्रेज़ौस्क प्रधान मंत्री बने। उन्होंने यूरोपीय संघ और नाटो सदस्यता में तेजी लाने के लिए काम करने का संकल्प लिया।

2002 नवंबर - प्राग में नाटो शिखर सम्मेलन में गठबंधन में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित देशों की सूची में लिथुआनिया शामिल है।

2002 दिसंबर - कोपेनहेगन में यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन ने लिथुआनिया को 2004 में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया।

2003 जनवरी - रोलैंडस पाकास राष्ट्रपति चुने गए।

2003 मई - लिथुआनियाई जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ में शामिल होने के पक्ष में मतदान हुआ।

2003 नवंबर - प्रदर्शनकारियों ने अपने कार्यालय और रूसी संगठित अपराध के बीच संबंधों के आरोपों के बाद राष्ट्रपति पाकास के इस्तीफे की मांग की।

2003 दिसंबर - राष्ट्रपति पाकास के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने के बाद संसदीय जांच ने निष्कर्ष निकाला कि उनके कार्यालय और रूसी संगठित अपराध के बीच कथित संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

2004 मार्च - लिथुआनिया नाटो में शामिल हुआ।

2004 अप्रैल - संसद ने रोलैंडस पाकास पर महाभियोग चलाया और बर्खास्त किया।

2004 मई - लिथुआनिया यूरोपीय संघ में शामिल होने वाले 10 नए राज्यों में से एक है।

2004 जून - वाल्दास एडमकुस फिर से राष्ट्रपति चुने गए।

2004 अक्टूबर - अल्गिरदास ब्राज़ौस्कस आम चुनावों के बाद नए गठबंधन में प्रधान मंत्री के रूप में कार्य करता है।

2004 नवंबर - लिथुआनिया नए यूरोपीय संघ के संविधान की पुष्टि करने वाला पहला यूरोपीय संघ का सदस्य देश बना।

2004 दिसंबर - इग्नालिना परमाणु ऊर्जा स्टेशन पर रिएक्टर एक यूरोपीय संघ की प्रवेश आवश्यकताओं के अनुरूप बंद हो जाता है। इसी समझौते के तहत दूसरे रिएक्टर को 2009 तक बंद करना है।

2005 जनवरी - विदेश मंत्री वैलियोनिस ने स्वीकार किया कि वह कभी सोवियत केजीबी रिजर्व में एक अधिकारी थे। उनके अतीत और दो अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ इसी तरह के आरोपों की संसदीय जांच शुरू की गई है।

2005 मार्च - राष्ट्रपति एडमकस ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में मई में मास्को में समारोह में भाग लेने के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया।

2005 जून - लेबर पार्टी के नेता विक्टर उस्पस्किच ने आरोपों पर अर्थशास्त्र मंत्री के रूप में इस्तीफा दे दिया कि उनके व्यापारिक व्यवहार ने नैतिकता के नियमों का उल्लंघन किया था। उनकी पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन के हिस्से के रूप में चलती है।

2005 सितंबर-अक्टूबर - रूसी लड़ाकू जेट लिथुआनियाई क्षेत्र पर दुर्घटनाग्रस्त, मास्को के साथ राजनयिक तनाव बढ़ा। जब जांच में तकनीकी और मानवीय त्रुटि पाई जाती है तो स्थिति खराब हो जाती है।

2006 मई-जुलाई - लेबर पार्टी के सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर निकलने के बाद प्रधान मंत्री अल्गिरदास ब्रेज़ौस्कस ने इस्तीफा दे दिया। संसद ने इस पद के लिए राष्ट्रपति के दूसरे उम्मीदवार गेदीमिनस किर्किलस को मंजूरी दी।

2008 मई - संसद ने ईयू लिस्बन संधि की पुष्टि की।

यूरोपीय संघ आयोग ने देश की मुद्रास्फीति दर का हवाला देते हुए 1 जनवरी 2007 को यूरो क्षेत्र में शामिल होने के लिए लिथुआनिया के आवेदन को ठुकरा दिया।

2008 अप्रैल-मई - लिथुआनिया ने ऊर्जा चिंताओं पर यूरोपीय संघ-रूस साझेदारी वार्ता को पटरी से उतारने की धमकी दी, लेकिन अन्य सदस्य राज्यों के दबाव में वीटो छोड़ दिया।

2008 जून - संसद ने सोवियत और नाजी प्रतीकों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध किसी भी पूर्व सोवियत गणराज्य में सबसे कठिन हैं।

2008 अक्टूबर - रूढ़िवादी होमलैंड यूनियन पार्टी संसदीय चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन गई, जिसने प्रधान मंत्री गेडिमिनस किर्किलस के सोशल डेमोक्रेट्स को दूसरे स्थान पर धकेल दिया।

2008 नवंबर - होमलैंड यूनियन के नेता एंड्रिअस कुबिलियस ने केंद्र-दक्षिण गठबंधन सरकार के प्रमुख के रूप में प्रधान मंत्री नियुक्त किया।

2009 अप्रैल - राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने यह दिखाते हुए आंकड़े प्रकाशित किए कि 2009 की पहली तिमाही में लिथुआनिया का सकल घरेलू उत्पाद पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 12.6% गिर गया।

2009 मई - यूरोपीय संघ के बजट आयुक्त दलिया ग्रीबॉस्काइट, एक स्वतंत्र के रूप में खड़े होकर, 68% से अधिक मतों के साथ राष्ट्रपति चुनाव जीत गए।

2009 दिसंबर - लिथुआनिया की यूरोपीय संघ की प्रवेश आवश्यकताओं के अनुरूप, इग्नालिना परमाणु ऊर्जा स्टेशन पर दूसरा रिएक्टर बंद कर दिया गया है।

2011 जुलाई - लिथुआनिया ने मिखाइल गोलोवाटोव की रिहाई पर ऑस्ट्रिया का विरोध किया, एक पूर्व सोवियत अधिकारी जनवरी 1991 में एक विनियस टेलीविजन टॉवर पर सोवियत विशेष बलों के हमले पर लिथुआनिया में चाहता था जिसमें 14 नागरिक मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। ऑस्ट्रिया का कहना है कि मामले पर लिथुआनियाई जानकारी गोलोवाटोव की हिरासत को सही ठहराने के लिए "बहुत अस्पष्ट" थी।

2012 जनवरी - सरकारी सलाहकार विर्गिस वैलेंटाइनाविसियस का कहना है कि लिथुआनिया 2014 में यूरो मुद्रा को अपनाने की राह पर है, हालांकि राष्ट्रपति ग्रिबाउस्काइट का कहना है कि लक्ष्य चार प्रतिशत से अधिक की मुद्रास्फीति दर को देखते हुए "अवास्तविक" है।


सभी समय के शीर्ष 10 लिथुआनियाई ऐतिहासिक आंकड़े

लिथुआनिया का इतिहास उन महान नेताओं और ऐतिहासिक नायकों से भरा हुआ है जिन्होंने लिथुआनिया को वह बनाया है जो आज है. लिथुआनिया के लंबे और गौरवपूर्ण इतिहास की अवधि को देखने के बाद, यहां हमारी अब तक की शीर्ष १० लिथुआनियाई ऐतिहासिक शख्सियतों की सूची है।

लिथुआनिया का इतिहास उन महान नेताओं और ऐतिहासिक नायकों से भरा हुआ है जिन्होंने लिथुआनिया को वह बनाया है जो आज है. लिथुआनिया के लंबे और गौरवपूर्ण इतिहास की अवधि को देखने के बाद, यहां हमारी अब तक की शीर्ष १० लिथुआनियाई ऐतिहासिक शख्सियतों की सूची है।

1. गेडिमिनस (सी. 1275-1341)

लिथुआनिया के सबसे अधिक याद किए जाने वाले ग्रैंड ड्यूक्स में से एक, गेडिमिनस को अपने राज्य को यूरोप में माना जाने वाला एक खिलाड़ी बनाने का श्रेय दिया जाता है - और देश की राजधानी, विनियस की स्थापना के साथ।

सभी खातों के अनुसार, गेडिमिनस एक शानदार शासक और रणनीतिकार थे, जिन्होंने दक्षिण-पूर्व में स्लावोनिक भूमि में अपने क्षेत्र का विस्तार किया (लिथुआनिया के ग्रैंड डची का क्षेत्र उनके पोते के शासन के तहत काला सागर तक पहुंच जाएगा) और दबाव को रोक कर रखा पश्चिम से युद्धरत ईसाई मिशनरी।

हालांकि गेदीमिनस ने कभी भी ईसाई धर्म को स्वीकार नहीं किया, उन्होंने प्रसिद्ध ईसाई व्यापारियों और किसानों को अपनी भूमि - और अपने शहर - में आने और बसने के लिए आमंत्रित किया - उन्हें टैक्स ब्रेक और धार्मिक सहिष्णुता का वादा किया जो ग्रैंड डची को अपने दिनों के अंत तक चिह्नित करने के लिए आया था।

2. मिन्दौगास (सी. 1203-1263)

मिन्दौगास लिथुआनिया के इतिहास का प्रारंभिक बिंदु है, लिथुआनिया का पहला और एकमात्र राजा अपने शासन के तहत परस्पर विरोधी लिथुआनियाई सरदारों को एकजुट करने के बाद - कुछ रणनीतिक विवाहों द्वारा, अन्य रणनीतिक हत्याओं द्वारा - मिंडौगस ने रोम के पोप को 1251 में रोमन कैथोलिक के रूप में बपतिस्मा लेने के लिए लिखा और दो साल बाद राजा का ताज पहनाया।

मिंडौगस के उद्भव के बारे में बहुत कम जानकारी है और यहां तक ​​कि उनकी शाही सीट के स्थान पर भी बहस होती है, लेकिन उनका नाम अब लिथुआनिया में कई सड़कों के नाम से जाना जाता है और उनकी ताजपोशी का अनुमानित दिन, ६ जुलाई, एक राष्ट्रीय अवकाश है।

'लिथुआनिया के सीज़र' बनने के बाद, मिन्दौगास का शासन एक हत्या की साजिश से समाप्त हो गया जिसने राज्य को उथल-पुथल और अनिश्चितता के एक विस्तारित दौर में धकेल दिया। ईसाई धर्म ने मूर्तिपूजक लिथुआनियाई लोगों के बीच पकड़ नहीं बनाई (माना जाता है कि मिंडौगस ने अपने जीवन के अंत में नए भगवान पर फिर से कब्जा कर लिया था) और उन्होंने एक राजवंश शुरू नहीं किया, लेकिन मिंडौगस राज्य के अर्ध-पौराणिक संस्थापक का स्थान लेता है लिथुआनिया।

3. व्यतोतास (सी. 1350-1430) और जोगैला (सी. 1352-1434)

दो चचेरे भाइयों (और गेदीमिनस के पोते) के बीच प्रेम-घृणा संबंध व्याटौटास और जोगैला (या जगियेलो) कई तरह से लिथुआनिया और पोलैंड के भाई राष्ट्रों के बीच तनाव को दर्शाता है, जो पहले शासक जोगैला के तहत एक व्यक्तिगत संघ में शामिल हो गया था। लिथुआनिया के ग्रैंड ड्यूक और पोलैंड के राजा दोनों।

सत्ता के लिए संघर्ष की कई अवधियों के बाद, जिसके दौरान दोनों ने एक दूसरे को कैद किया था और उस समय लिथुआनिया के सबसे बड़े दुश्मनों, ट्यूटनिक ऑर्डर के साथ, एक दूसरे को गद्दी से उतारने के लिए, व्याटौटास और जोगैला ने अंततः एक महान विरासत हासिल करने के लिए शांति स्थापित की। उन्होंने पोलैंड के साथ क्रिवो के 1387 संघ के तहत लिथुआनिया का ईसाईकरण किया, और ग्रुनवल्ड की ऐतिहासिक लड़ाई (या लिथुआनियाई में सालगिरिस, आज लगभग हर लिथुआनियाई टीम के खेल में इस्तेमाल किया जाने वाला नाम) में ट्यूटनिक नाइट्स को हराया, पोलैंड की संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा खतरा था। और लिथुआनिया अस्तित्व से बाहर।

4. मार्टीनास मावीदास (1520-1563)

लिथुआनियाई स्थानीय भाषा को विद्वानों की भाषाओं की श्रेणी में शामिल होने में देर हो गई थी और यह 1547 तक नहीं था कि पहली लिथुआनियाई पुस्तक प्रिंटिंग प्रेस से निकली थी। इसके लेखक, युवा प्रोटेस्टेंट पुजारी मार्टीनास मैविदास ने वे पंक्तियाँ लिखीं जिन्हें लिथुआनियाई विद्यार्थियों की पीढ़ियों को दिल से सीखना पड़ा है।

जबकि लिथुआनिया द्वारा ईसाई धर्म अपनाने के तुरंत बाद हाथ से लिखी गई प्रार्थना पुस्तकें सामने आई थीं, मालवीदास की धर्मशिक्षा (या "केटकिज़्मो प्रस्ती odžiai" - "सिंपल वर्ड्स ऑफ़ कैथेचिस्म") पहली मुद्रित पुस्तक थी। और यह लिथुआनिया में मुद्रित नहीं था, बल्कि पूर्वी प्रशिया में (जिसका हिस्सा लिथुआनिया माइनर कहा जाएगा) जो लिथुआनिया में कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व से प्रोटेस्टेंट लिथुआनियाई लोगों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल था।

यह लिथुआनिया माइनर में था कि माविदास ने एक पुजारी के रूप में अपना करियर बिताया, अपने पैरिशियन की शिक्षा का ख्याल रखा और विपुल रूप से लिखा, ज्यादातर प्रार्थना पुस्तकें और भजन।

5. जोनास बसनवीसियस (1851-1927)

यदि कोई राष्ट्रीय कुलपति की उपाधि का हकदार है, तो वह जोनास बसानाविशियस है, जिसकी दाढ़ी वाली उपस्थिति 50 लिटा बिलों से लिथुआनियाई लोगों को घूरती थी और लिथुआनिया के लगभग हर शहर में उनके नाम पर स्मारकों और सड़कों से अधिकार जारी रखती है।

व्यापार के चिकित्सक, बासनवीसियस, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के राष्ट्रीय पुनरुद्धार आंदोलन के नेताओं में से एक थे और उन्होंने आधुनिक लिथुआनियाई राष्ट्र के निर्माण के हर कदम में भाग लिया। उन्होंने पहले लिथुआनियाई अखबार की स्थापना की, Au&scaronra, १९०५ ग्रेट सेमास ऑफ विल्नियस की आयोजन समिति की अध्यक्षता की और १६ फरवरी १९१८ को लिथुआनिया के स्वतंत्रता अधिनियम के हस्ताक्षरकर्ता थे।

6. क्वीन बोना स्कोर्ज़ा (1494-1557)

एक विदेशी और सत्ता चाहने वाली महिला के रूप में, बोना स्कोर्ज़ा को इतिहासकारों द्वारा लंबे समय से बदनाम किया गया है। उन्हें सबसे बड़ी पुनर्जागरण प्रेम कहानियों में से एक में मुख्य खलनायक के रूप में लिया गया था, जो कि उनके बेटे सिगिस्मंड ऑगस्टस और बारबोरा रेडविलाइट (या बारबरा रैडज़विल) के बीच, लिथुआनिया की सबसे खूबसूरत महिला थी, जिसे कथित तौर पर उसकी नाराज सास द्वारा जहर दिया गया था।

हाल के वर्षों में, हालांकि, रानी बोना का काफी हद तक पुनर्वास किया गया है, इतिहासकारों ने पोलैंड और लिथुआनिया में इतालवी पुनर्जागरण लाने में उनकी भूमिका पर सहमति व्यक्त की है।

मिलान के हाउस ऑफ़ स्फ़ोर्ज़ा की एक सदस्य, बोना की शादी सिगिस्मंड द ओल्ड, पोलैंड के राजा और लिथुआनिया के ग्रैंड ड्यूक से लगभग 30 साल वरिष्ठ, नेपल्स में एक समारोह में दूल्हे के बिना हुई थी। उत्तर की ओर बढ़ते हुए, बोना अपने साथ इतालवी रसोइयों, वास्तुकारों और कारीगरों का एक दल लेकर आई, जिनका उत्तर-पूर्वी यूरोप में कला और संस्कृति पर प्रभाव को कम करके आंका नहीं जा सकता। बोना को पोलिश-लिथुआनियाई आहार में सब्जियों को शामिल करने का श्रेय भी दिया गया, हालांकि इतिहासकारों का कहना है कि यह एक अतिशयोक्ति है।

क्वीन बोना ने ग्रैंड डची में विभिन्न आर्थिक और कृषि सुधारों को लागू किया, जिसमें दूरगामी वैलाच सुधार शामिल था, जिससे खुद को एक अविश्वसनीय रूप से समृद्ध जमींदार बना दिया। उनकी कुछ विरासत विनियस में लिथुआनिया के ग्रैंड ड्यूक्स के हाल ही में पुनर्निर्मित पैलेस में प्रदर्शित है।

7. स्टीफन बाथरी (1533-1586)

पोलैंड के राजा और लिथुआनिया के ग्रैंड ड्यूक के रूप में ट्रांसिल्वेनिया के एक राजकुमार स्टीफन बाथोरी (या लिथुआनियाई में स्टेपोनास बटोरस) का दशक भर का शासन राष्ट्रमंडल के इतिहास में उच्च बिंदुओं में से एक है। लिथुआनिया में, उनकी सबसे बड़ी विरासत १५७९ में विलनियस विश्वविद्यालय की स्थापना है, जिसने लंबे समय तक उनके नाम को बोर किया।

8. जर्गिस बीलिनिस (1846-1918)

लिथुआनियाई रूसी साम्राज्य के शासन के खिलाफ उठे, जिसने उन्नीसवीं शताब्दी में कई बार उन पर लगाम लगाई और इस तरह के एक असफल प्रयास के बाद, 1863 में, रूस ने फैसला किया कि अपने उत्तर-पश्चिमी विषयों की राष्ट्रीय भावनाओं को कुचलने का एकमात्र तरीका था लैटिन वर्णमाला में प्रेस पर प्रतिबंध लगाओ।

प्रतिबंध ४० वर्षों के लिए प्रभावी था और इसने एक विलक्षण पेशे को जन्म दिया, नाइग्ने और स्कारोनियाई, जो मोटे तौर पर "पुस्तक तस्कर" " या "पुस्तक तस्कर" के रूप में अनुवाद करता है। Jurgis Bielinis इस अवधि के सबसे प्रमुख पुस्तक तस्करों में से एक था, जो लिथुआनियाई पुस्तकों और पूर्वी प्रशिया (या लिथुआनिया माइनर) में छपी पत्रिकाओं को लिथुआनिया में उचित रूप से तस्करी करता था। इतिहासकारों का अनुमान है, कि बीलिनिस का नेटवर्क सभी अवैध लिथुआनियाई पुस्तकों में से आधे के लिए जिम्मेदार था, जो प्रेस प्रतिबंध के दौरान प्रसारित हुई थी।

9. जोनास emaitis (1909-1954)

हालांकि जोनास ज़ेमाइटिस कभी भी राजनेता नहीं थे और किसी भी निर्वाचित कार्यालय के लिए नहीं चले, उन्हें 2009 में लिथुआनिया का चौथा राष्ट्रपति घोषित किया गया। यह शायद खुद ज़मेतिस को भी आश्चर्यचकित कर देता अगर वह जीवित होता, लेकिन शीर्षक देश के उस हिस्से पर उनके नेतृत्व को पहचानता है जो द्वितीय विश्व युद्ध के विजेताओं द्वारा यूरोप में शांति की घोषणा के बाद लगभग एक दशक तक सोवियत कब्जे के खिलाफ लड़ना जारी रखा था।

सेमाईटिस, जिसने कोडनेम व्याटौटास को अपनाया था (जिसका मतलब है कि वह शायद राष्ट्रपति बनने के बारे में सोचना नहीं चाहता था), १९४९ से १९५३ में सोवियत एजेंटों द्वारा उनकी गिरफ्तारी तक, लिथुआनियाई फ्रीडम आर्मी, एक छापामार प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

जनरल सेमेइटिस के पास अब लिथुआनिया की सैन्य अकादमी है जिसका नाम उनके नाम पर रखा गया है और विनियस में राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के सामने खड़ी उनकी एक अप्रतिम मूर्ति है।

१०. तदेउज़ कोसियस्ज़को (१७४६-१८१७)

तादास कोस्सिउ और स्कारोंका, या तदेउज़ कोसियसज़को, कई राष्ट्रों के लिए एक राष्ट्रीय नायक है: लिथुआनियाई, पोल्स, बेलारूसियन और अमेरिकी। उनका नाम ऑस्ट्रेलिया की सबसे ऊंची चोटी भी है।

लिथुआनिया के ग्रैंड डची में एक भूमि-मालिक परिवार से आने वाले, कोसियस्ज़को ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में लड़ाई लड़ी और यूरोप लौटने के बाद, रूसी साम्राज्य के खिलाफ पोलैंड-लिथुआनिया में विद्रोह का नेतृत्व किया। पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल के विघटन और खोए हुए गणराज्य के इस अंतिम पुत्र को परम रोमांटिक नायक बनाने के कारण, कोसियसज़को विद्रोह विफल हो गया।


लिथुआनिया अपने अतीत के साथ और इज़राइल के साथ एक नया रिश्ता बना रहा है

अगस्त में योसी लेवी ने लिथुआनिया में इज़राइल के राजदूत के रूप में अपनी भूमिका ग्रहण करने के तुरंत बाद, उनकी सहायक, एना मैज़ेल, एक यहूदी समुदाय केंद्र के सामने जमीन पर मिट्टी से तैयार की गई एक स्वस्तिक-उनके कार्यकाल की एक अशुभ शुरुआत थी। उसने अपनी प्रतिक्रिया में सावधानी से रौंद दिया, आश्वासन देते हुए अपराध की निंदा की। उन्होंने कहा, "हम यहूदी यहां आरोप लगाने नहीं आए हैं।" "हम 2019 के लिथुआनिया को दोष नहीं देते हैं।"

लेवी परिवर्तन के एक क्षण में लिथुआनिया पहुंचे: भले ही देश यहूदी-विरोधी घटनाओं से निपटता है, यह एक ज़ायोनी समर्थक रीब्रांडिंग के बीच में है जो द्वितीय विश्व युद्ध में देश के अनुभव की एक अपूर्ण सार्वजनिक पुन: परीक्षा को हार्दिक प्रशंसा के साथ जोड़ता है प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के तहत इज़राइल के लिए।

अगस्त में योसी लेवी ने लिथुआनिया में इज़राइल के राजदूत के रूप में अपनी भूमिका ग्रहण करने के तुरंत बाद, उनकी सहायक, एना माईज़ेल, एक यहूदी समुदाय केंद्र के सामने जमीन पर मिट्टी से तैयार की गई एक स्वस्तिक-उनके कार्यकाल की एक अशुभ शुरुआत थी। उसने अपनी प्रतिक्रिया में सावधानी से रौंद दिया, आश्वासन देते हुए अपराध की निंदा की। उन्होंने कहा, "हम यहूदी यहां आरोप लगाने नहीं आए हैं।" "हम 2019 के लिथुआनिया को दोष नहीं देते हैं।"

लेवी परिवर्तन के एक क्षण में लिथुआनिया पहुंचे: भले ही देश यहूदी-विरोधी घटनाओं से निपटता है, यह एक ज़ायोनी समर्थक रीब्रांडिंग के बीच में है जो द्वितीय विश्व युद्ध में देश के अनुभव की एक अपूर्ण सार्वजनिक पुन: परीक्षा को हार्दिक प्रशंसा के साथ जोड़ता है प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के तहत इज़राइल के लिए।

नेतन्याहू लिथुआनियाई प्रधान मंत्री सॉलियस स्केवर्नेलिस के साथ अपनी मित्रता के लिए आलोचनाओं के घेरे में आ गए हैं, जिन्हें ऐतिहासिक आख्यानों को बढ़ावा देने के प्रयासों में एक भागीदार के रूप में देखा जाता है जो होलोकॉस्ट में लिथुआनियाई लोगों की भूमिका को कम करते हैं और सोवियत का विरोध करने वाले नाजी सहयोगियों का महिमामंडन करते हैं। लेकिन देश ने अपने अतीत के साथ एक नए रिश्ते की दिशा में कठिन कदम उठाना शुरू कर दिया है।

इज़राइल के प्रति लिथुआनिया का गर्मजोशी प्रलय की विरासत के साथ एक नई गणना की शुरुआत के साथ आया है। देश के उथल-पुथल वाले युद्ध और युद्ध के बाद के इतिहास के प्रति मुख्यधारा के लिथुआनियाई दृष्टिकोण में जीवित साम्यवाद की लंबी विशेषाधिकार प्राप्त कहानियां हैं और सोवियत काल के अपराधों को नाजी काल के साथ सममूल्य पर सेट किया गया है। मई में, उस कथा को एक सार्वजनिक प्रसारण प्राप्त हुआ, जब लिथुआनियाई पुलिस बटालियन के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के एक पादरी को हजारों यहूदियों की हत्या करने का आरोप लगाया गया था, उसे सैनिकों की सेवा के लिए अपने काम के लिए एक पट्टिका से सम्मानित किया गया था। अखबार के कॉलम और राजनीतिक भाषणों में, लिथुआनियाई पीड़ा और लिथुआनियाई लोगों के कामों के संदर्भ में, जिन्होंने होलोकॉस्ट के दौरान यहूदियों की मदद की, अक्सर नरसंहार के किसी भी उल्लेख की ऊँची एड़ी के जूते पर तेजी से आते हैं।

2006 में, देश के मुख्य अभियोजकों ने एक गाँव के युद्धकालीन विनाश की जाँच शुरू की। उस जांच के हिस्से के रूप में, उन्होंने यहूदी यहूदी बस्ती के बचे लोगों के एक समूह पर सोवियत समर्थक गुरिल्लाओं में शामिल होने का आरोप लगाया, जिसका अर्थ यह था कि वे कम्युनिस्ट समर्थक थे। लेकिन आरोप यह पहचानने में विफल रहे कि नाजियों को हराने की आशा रखने वालों के बीच उनका मार्ग सामान्य था। उनमें से दो गुरिल्ला, जो अब बुजुर्ग हैं, इज़राइल में आधारित थे। वे लिथुआनिया की राजधानी विलनियस लौटने से डरते थे, इस बारे में अनिश्चित थे कि उनसे किस तरह की गवाही देने की उम्मीद की जाएगी। आम राय यह थी कि यहूदी बस्ती से बचे लोग न्याय से बच रहे थे। इसराइल नाराज था. एक पूर्व इजरायली राजदूत ने जांच की निंदा की, और उस समय इजरायल के विदेश मंत्रालय के डिप्टी जनरल डायरेक्टर पिनहास अवीवी ने इजरायली दैनिक को बताया हारेत्ज़, "मंत्रालय यहूदी पक्षपातियों के उत्पीड़न को बहुत गंभीरता से लेता है।"

२०१० में, नाज़ी शिकारी एफ़्रैम ज़ुरॉफ़, जिसने फ़ासीवादी युद्ध अपराधियों को मुकदमे में लाने में मदद की, ने लिखा: "दुनिया में कहीं भी सरकार इतनी हद तक नहीं गई है कि होलोकॉस्ट [जैसे लिथुआनिया में] में उनकी भूमिका को अस्पष्ट कर सके।" यहूदी प्रतिरोध सेनानियों ने सोवियत संघ के साथ सहयोग करने वाले किसी भी सबूत के बाद भागते हुए राज्य संस्थान कथित नाजी सहयोगियों के खिलाफ न्याय की मांग में अपने पैर खींच रहे थे।

लेकिन जब यहूदी बस्ती के लड़ाकों के इतिहास की बात आती है, तो सोच में बदलाव आ रहा है। फ़ानिया ब्रानकोवस्काजा उन यहूदी बस्ती में से एक थीं, जिन्हें एक अभियोजक को गवाही देने के लिए बुलाया गया था, जब उनके गुरिल्ला समूह के नागरिकों के खिलाफ नरसंहार में भाग लेने के आरोप फिर से सामने आए। उसे लिथुआनियाई मीडिया में एक सोवियत सहयोगी और एक यहूदी के रूप में चित्रित किया गया था - लेकिन एक यहूदी बस्ती और एक लिथुआनियाई के रूप में नहीं। लेकिन फिर, 2017 में, उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिला, और 2018 में, डेल्फ़ी समाचार वेबसाइट ने उन्हें होलोकॉस्ट मेमोरी के बारे में बोलने के लिए एक सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया।

देश ने शहरों और कस्बों में यहूदी विरासत का जश्न मनाना और उसकी मार्केटिंग करना शुरू कर दिया है। मुख्यधारा के राजनेता और मीडिया अब लिथुआनिया के खोए हुए निवासियों के लिए सामूहिक शोक की बात करते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध ने विशाल लिथुआनियाई यहूदी समुदाय के बहुमत को नष्ट कर दिया, जिसकी संख्या युद्ध से पहले १५०,००० से अधिक थी, और कुछ बचे लोगों में से अधिकांश को तितर-बितर कर दिया। आधिकारिक कथा में, और परिवारों के भीतर व्यक्तिगत कहानियों को पारित किया गया, लिथुआनियाई पीड़ित थे, और सहयोगी बाहरी थे। जैसा कि रॉबर्ट वैन वोरेन ने अपनी पुस्तक में लिखा है अपाच्य अतीत: लिथुआनिया में प्रलय, युद्ध के बाद की मौतों और पीड़ाओं को लिथुआनियाई सामूहिक स्मृति में गहराई से अंकित किया गया था और नाजियों के अधीन वर्षों में छाया हुआ था। लिथुआनिया ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, और पश्चिम में अपनी पीड़ा की कहानी को स्वीकार करने के लिए संघर्ष किया, लिथुआनिया में कई लोगों ने इसे अनुचित माना कि राष्ट्रपति अल्गिरदास ब्राज़ौस्कस ने 1995 में इज़राइली संसद में एक भाषण में प्रलय में लिथुआनियाई भागीदारी के लिए माफी मांगी। इज़राइल में लिथुआनियाई यहूदी लगा कि यह बहुत कम है, बहुत देर हो चुकी है। लेकिन ऐतिहासिक न्याय के साथ वह रिश्ता बदलना शुरू हो गया है।

अब, उच्च श्रेणी के राजनेता अब यहूदी छुट्टियों पर बधाई ट्वीट करते हैं, होलोकॉस्ट से संबंधित स्मारक दिनों को चिह्नित करते हैं, और अब उसी सांस में उल्लेख करने के लिए मजबूर महसूस नहीं करते हैं जो लिथुआनियाई राष्ट्र को भी भुगतना पड़ा। और एक दूसरे के राष्ट्रीय आख्यानों को चुनौती देने के खिलाफ एक नई आम सहमति इजरायल-लिथुआनियाई संबंधों का एक अभिन्न अंग बन रही है।

बदलाव की शुरुआत 2016 में हुई थी। एक मील का पत्थर अगस्त 2016 में विलनियस के उत्तर में एक घंटे की ड्राइव पर एक शहर मोलेटाई में होलोकॉस्ट पीड़ितों को मनाने के लिए एक स्मारक मार्च था। जाने-माने नाटककार और निर्देशक मारियस इवास्केविसियस के एक सार्वजनिक आह्वान के बाद, मार्च ने 1,000 से अधिक उपस्थित लोगों को इकट्ठा किया और प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों को आकर्षित किया।

उस अगस्त में मोलेताई में, तत्कालीन राष्ट्रपति डालिया ग्रीबाउस्काइट ने सामूहिक हत्या स्थल पर एक पत्थर रखा था, जो लिथुआनिया में तत्कालीन इजरायली राजदूत और यहूदी समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ था। राष्ट्रपति ने विनियस में राष्ट्रपति भवन में, पोलैंड में ऑशविट्ज़ एकाग्रता शिविर के स्थल पर और यरुशलम में याद वाशेम होलोकॉस्ट स्मारक में स्मारक कार्यक्रमों में भाग लिया था, लेकिन मोलेटाई में घटना अलग थी। वह, अन्य उच्च श्रेणी के राजनेताओं के साथ, एक संकेत भेजने के लिए एक दूरस्थ क्षेत्र की यात्रा की कि उस दिन से होलोकॉस्ट मेमोरी कई सामूहिक हत्या स्थलों वाले देश में मुख्यधारा के अनुष्ठान का हिस्सा होगी। एक महीने बाद, पनेरियाई में विनियस यहूदी बस्ती के विनाश की याद में एक जुलूस में फिर से भीड़ उमड़ी।

यह सुनिश्चित करने के लिए, स्वतंत्रता दिवस परेड (2019 में एक सहित) में दूर-दराज़ समूहों को अभी भी "लिथुआनियाई लोगों के लिए लिथुआनिया" का जाप करते सुना जा सकता है। और जुलाई में, नाजियों की सहायता करने वाले संदिग्ध लोगों को समर्पित एक पट्टिका को हटाने और एक सड़क का नाम बदलने से प्रदर्शनकारियों की भीड़ उमड़ पड़ी। लेकिन जब लिथुआनियाई राष्ट्रवादियों को जप करते सुना गया "जुडेन रौस"- यहूदी बाहर- 2008 में (और छह व्यक्तियों को एक साल बाद घृणा के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था), राष्ट्रवादी आंदोलन के चरम सीमाओं ने एलजीबीटीक्यू समुदाय और मुस्लिम शरणार्थियों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

यूक्रेन में यहूदी-विरोधी परास्त होने से बहुत दूर है। विल्नियस यूनिवर्सिटी में होलोकॉस्ट मेमोरी पर शोध करने वाले वायलेट डावोलियूट ने देखा है कि हालांकि मध्य और पूर्वी यूरोप में यहूदी इतिहास के आसपास की वर्जनाएं गिर रही हैं, ऐतिहासिक शोध का अत्यधिक राजनीतिकरण किया गया है। "सब कुछ इतना राजनीतिक और टकरावपूर्ण है कि ... तटस्थ शोध करना मुश्किल है," उसने कहा। विशेष रूप से, कुछ लाल रेखाएँ बनी हुई हैं कि लिथुआनियाई प्रतिष्ठान - और समाज का एक बड़ा हिस्सा - आधिकारिक आख्यान को चुनौती देने के लिए कितनी दूर जाने को तैयार है। “हमने झेला, हमारे यहूदियों ने भी झेला। वे, जर्मन और यूएसएसआर, अपराधी थे, "डेवोलियूट ने स्थापना परिप्रेक्ष्य के सारांश में कहा।

2014 में क्रीमिया पर रूसी आक्रमण के बाद इज़राइल आमतौर पर लिथुआनिया में अधिक लोकप्रिय हो गया। लिथुआनिया ने देखा कि नाटो, पश्चिमी शक्तियों और यूरोपीय संसद से हाथ मिलाना क्षेत्र में रूस के तेजी से आक्रामक रुख को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं था। एक नए शक्तिशाली रूस के जवाब में, लिथुआनिया ने 2013 और 2016 के बीच अपने सैन्य खर्च को दोगुना कर दिया और फिर से भर्ती की शुरुआत की। मई 2015 में व्याटौटास मैग्नस विश्वविद्यालय में बोलते हुए, इज़राइल के पूर्व लिथुआनियाई राजदूत, डेरियस डीगुटिस ने देशभक्ति को स्थापित करने के लिए इजरायल की भर्ती की प्रशंसा की, जिसे उन्होंने बनाए रखा, रोजगार से डेटिंग तक इजरायल के जीवन के अन्य क्षेत्रों में प्रवेश किया। जैसे ही मई 2019 में लिथुआनिया के राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आए, सार्वजनिक प्रसारक एलआरटी ने उम्मीदवारों से यह कहने के लिए कहा कि वे महिलाओं को नियुक्त करने के विचार पर कहां खड़े हैं- और पंडितों ने सकारात्मक शब्दों में, इज़राइल को उनकी प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करने के लिए संदर्भित किया।

इस वर्ष, स्केवर्नेलिस ने स्वेच्छा से लिथुआनिया को "यूरोपीय संघ में इज़राइल की आवाज़" घोषित किया, जो इज़राइल की स्थिति को विस्तृत कर सकता है। उन्होंने इजरायल की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान फिलिस्तीनी प्राधिकरण (पीए) के प्रतिनिधियों से नहीं मिलने का भी फैसला किया। यद्यपि लिथुआनिया पीए को विकास सहायता प्रदान करना जारी रखता है - इसका ध्यान लोकतंत्र से उद्यमिता पर स्थानांतरित हो गया है - ऐसा प्रतीत होता है कि यह बाद में एक राजनयिक दायित्व पर विचार कर रहा है। 2011 में, लिथुआनिया ने फिलिस्तीनी यूनेस्को की सदस्यता के खिलाफ मतदान किया।

लिथुआनिया इजरायली हथियार खरीदता है। यह आत्मरक्षा के आख्यान के इज़राइल के अधिकार को भी खरीदता है। लिथुआनिया के विदेश मंत्री हर बार ट्विटर पर इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह इजरायल के खिलाफ हिंसा के एक नए प्रकोप के बारे में सुनते हैं। ऐसा करते हुए, वह उसी पर लिथुआनिया के अधिकार की पुष्टि कर रहा है। बदले में, इजरायली अधिकारी लिथुआनिया के होलोकॉस्ट पुन: उभरने के त्रुटिपूर्ण आकस्मिक प्रयासों को स्वीकार करने के इच्छुक प्रतीत होते हैं।

पूर्वी यूरोपीय लोकलुभावन लोगों के लिए, इज़राइल आज एक "पुराना सपना साकार" है, राजनीतिक वैज्ञानिक और लोकलुभावनवाद विशेषज्ञ इवान क्रस्टेव ने पिछले वसंत में इजरायल के चुनावों के लिए लिखा था। दूसरे शब्दों में, एक इजरायल जो सैन्यवादी और निडर जातीय केंद्रित है, लिथुआनियाई और पूर्वी यूरोपीय नेताओं के लिए एक आरामदायक मॉडल की तरह महसूस करता है।

2018 की गर्मियों में, नेतन्याहू लिथुआनिया की यात्रा करने वाले पहले इज़राइली प्रधान मंत्री बने, और जब उन्होंने ऐसा किया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से देशों के नए मजबूत संबंधों के लिए नए ऐतिहासिक दृष्टिकोण को बांध दिया। "मेरा मानना ​​​​है कि अतीत के साथ आने से, यहूदी-विरोधी का मुकाबला करने का प्रयास, जैसा कि लिथुआनियाई सरकार कर रही है, नई पीढ़ियों को ऐतिहासिक त्रासदी के बारे में सच्चाई बता रही है ताकि भविष्य में ऐसे मामलों से बचा जा सके, इसके माध्यम से हम मजबूत द्विपक्षीय संबंध बना सकते हैं, ”उन्होंने संवाददाताओं से कहा। "एक बार फिर, जैसे प्रौद्योगिकियों के साथ, प्रगति के साथ, इसमें समान रूप से-हम एक साथ और अधिक कर सकते हैं।"

आलोचकों का कहना है कि लिथुआनिया ने लगभग पर्याप्त काम नहीं किया है - और राजनीतिक सुविधा के मामले में इज़राइल इसे हुक से हटा रहा है। कई लिथुआनियाई अपने युद्ध नायकों को होलोकॉस्ट अपराधियों के रूप में पुन: स्थापित करने के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन कुछ बदलाव, हालांकि अस्थिर हैं, निश्चित रूप से चल रहे हैं।

डाइवा रेपेकेइट वर्तमान में माल्टा में स्थित एक लिथुआनियाई पत्रकार हैं। ट्विटर: @daiva_hadiva


लिथुआनियाई इतिहास की मुख्य विशेषताएं: किंवदंती और इतिहास में लिथुआनियाई महिलाएं

लिथुआनिया की राष्ट्रीय पहचान - और शायद इसके अस्तित्व के संरक्षण में किसी ने भी लिथुआनियाई महिला की तुलना में अधिक योगदान नहीं दिया है।

लिथुआनियाई इतिहास के सभी अशांत समयों के दौरान लिथुआनियाई महिला ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अक्सर राष्ट्र की पहचान और यहां तक ​​​​कि इसके अस्तित्व के संरक्षण के लिए भारी बोझ और जिम्मेदारियों को ग्रहण किया। किंवदंती और महाकाव्य में लिथुआनियाई महिला का महिमामंडन किया गया था। रानी, ​​​​राजकुमारी, कुलीन महिला के रूप में, उन्होंने किंग्स और ग्रैंड ड्यूक के लिथुआनिया में खुद को प्रतिष्ठित किया। सदियों बाद, राष्ट्रीय पुनर्जागरण के दौरान, यहां तक ​​कि एक साधारण किसान की पत्नी के रूप में, वह खुद को मुखर करते हुए और लिथुआनिया की स्वतंत्रता की बहाली का मार्ग प्रशस्त करने में मदद करती देखी गई। जब स्वतंत्रता आई, तो उन्होंने नई ऊर्जा के साथ नए कर्तव्यों का निर्वाह किया और राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में अपने लिए नई ख्याति अर्जित की।

लिथुआनियाई महिला के साथ हमारे व्यवहार में, हमने अपनी पसंद को प्राचीन काल से लेकर 1918 में लिथुआनियाई स्वतंत्रता की बहाली तक प्रतिनिधि महिलाओं तक सीमित कर दिया है। लिथुआनियाई भाषा की पेचीदगियों से अनजान पाठक के मन में भ्रम से बचने के लिए, महिलाओं के उपनाम लगभग सभी उदाहरण पुल्लिंग रूप में लिखे गए हैं।

किंवदंती और प्रारंभिक इतिहास में

अनादि काल से, लिथुआनियाई लोगों के पास नारीत्व का अपना वी आदर्श रहा है। उनकी प्रतीकात्मक और एनिमेटेड पौराणिक कथाओं ने सिल्वन या वाटर स्प्राइट में स्त्री आदर्श को मूर्त रूप दिया, जिसे वे लौम कहते हैं, जो पश्चिमी यूरोपीय लोककथाओं की अच्छी परियों के समान है। सैकड़ों लोक कथाओं में आज तक जीवित यह आत्मा-नौकरानी, ​​आदर्श लिथुआनियाई महिला का एक प्रतीकात्मक व्यक्तित्व था: लंबा, चमकदार बालों वाली, नीली आंखों वाली, बक्सोम युवती, शांत और मधुर आवाज के साथ एक दयालु नर्स और मेहनती मातृ अभिभावक वृद्धों और बच्चों की।

किंवदंतियां- बीते हुए मानवतावादी या रोमांटिक युग की लोक रचनाएं- ने हमें कई तरह की महिलाएं दी हैं। इन महान महिलाओं में से कुछ वीर लिथुआनियाई युवतियों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उदाहरण के लिए, प्रमुख ड्र्यूड लिज़्देइका की पवित्र बेटी पजौता थी। लोक परंपरा यह है कि एक विदेशी गैर-आस्तिक से शादी करने और पुराने मूर्तिपूजक धर्म को धोखा देने के बजाय, उसने भेड़ियों को खुद को बलिदान कर दिया।

एक दूसरी पजौता ड्यूक केर्नियस की खूबसूरत बेटी थी। उसने जीवनसाथी और माँ के रूप में एक अनुकरणीय जीवन व्यतीत किया और अपनी प्रजा का सम्मान करती थी। जब वह मर गई, तो उसके बेटे कुकोविएटिस ने उसकी याद में asliai झील के किनारे पर एक लकड़ी का स्मारक बनवाया। कालांतर में यह लकड़ी का स्मारक सड़ गया और गिर गया, लेकिन इसके स्थान पर एक चमत्कारी लिंडन का पेड़ उभरा।

वफादारी एक और स्त्री गुण था जिसे ऐतिहासिक किंवदंतियों में सराहा गया।

The Lithuanian woman of earlier times liked to adorn herself, as these silver and amber ornaments from the 13th century testify.

Gražina, the wife of Liutaveras, Duke of Naugardukas, learned that her husband was plotting with the Teutonic Knights against his liege lord Vytautas. Donning her husband’s armor, Gražina led the forces of Naugardukas against the invading Teutonic Knights. Though the Knights were soundly defeated, Gražina fell in battle, preserving the honor of her household.

Another princess of Naugardukas was Živile, whose father would not permit her to marry her lover of lower rank. The lover, however, was determined to free her from her father’s clutches and with a band of Ruthenians forced his way into the castle. But Zivile’s loyalty to her father and his people was stroger than her love for the swain. She stabbed her would-be rescuer and ralied the men-at-arms of the castle to rout of enemy, Zivile stabbed herself to death, to atone for the strife she had caused.

IN THE LAND OF KINGS AND PRINCES

The first Lithuanian woman known in history is Queen Morta (Martha), wife of King Mindaugas, creator of the Lithuanian State. The stature of this renowned couple assumes monumental proportions in Lithuanian history of the thirteenth century. It was Mindaugas and Morta who accepted Christianity for the Lithuanian nation in 1251. Two years later Morta was crowned queen. An energetic and ambitious woman, she not only performed her family duties with dignity, receiving foreign envoys in the regal castles, but she also participated in the political activities of her husband, who spun intrigues against the Teutonic Knights, an aggressive crusading order recently established on the Baltic shores and scheming to plunder Lithuania. Queen Morta was Mindaugas’ adviser and assistant. Friends and strangers alike had to reckon with her. She died earlier than Mindaugas, the exact date being unknown.

In this painting by adolfas Valeska, which is in Chicago’s Holy Cross church, Morta is seen standing next to her husband Mindaugas as he being baptized into the Christian faith.

In the next century another woman enters the spotlight of Lithuanian history. She is Aldona, the daughter of the ruler, King Gediminas. Because of reasons of state, namely, Lithuania’s need to effect an alliance against the growing threat of the Teutonic O rder, Aldona was married to Wladislaw Lokietka’s son Casimir, who was later known as King Casimir the Great. For her dowry she asked her father for the return of 25,000 Polish prisoners of war to Poland—a country whose queen she was about to become. Amid universal acclaim and blessings, Aldona journeyed from Vilnius to Cracow, Poland’s capital. Unfortunately, she did not fare well in her new country. Her husband proved unfaithful. The queen sought solace in charitable work and music. She died a young woman, leaving two daughters, who later married into the Luxembourg and Habsburg families of the Holy Roman Empire. Aldona’s granddaughter became the wife of Emperor Charles IV.

The fate of Birute was different. To this day she is surrounded by emotional legends and a veil of poetry. This daughter of a Samogitian Duke from the Palanga seacoast became the wife of King Kestutis and the mother of the genius Vytautas the Great. Birute came to be regarded as guardian of the Lithuanian national hearth and symbol of dedicated Lithuanian motherhood. A mound held to be her burial site is still kept in high esteem after more than six hundred years.

Birute’s son, Vytautas, had an illustrious spouse, Ona, sister of Lord Sudimantas.

The legendary meeting of Birutė and Kęstutis is fancifully portrayed by children’s book illustrator Povilas Osmolskis.

The personality of Ona (Anna) is characteristic of the typical Lithuanian woman. A mother— but not merely a mother, she was a boon companion of her husband. She was never satisfied with only the maintenance of the household. Her interests were wide. She was a public figure and a politically-minded woman. (The women in Lithuania had been enjoying full freedom and taking part in public activities since olden times.) Ona loved honors, but she also knew how to make sacrifices. She did not avoid obstacles, but overcame them. During the political chaos in Lithuania toward the end of the fourteenth century, when her husband was thrown into prison by his wily cousin Jogaila, she assumed responsibility and devised a way for his escape by exchanging her clothes with him, letting him walk out in disguise while she remained in prison.

Free once more, Vytautas forced his cousin to recognize him as Grand Duke of Lithuania.

Under Vytautas Lithuania became one of the most powerful states of Europe. After Jogaila was crowned King of Poland, Vytautas became a virtual sovereign of the Lithuanian Grand Duchy. Ona was his co-worker. She signed writs of warranty which her husband would fulfill, received emissaries of the Teutonic Knights, went to their capital Marienburg as a hostage to advance her husband’s political cause. She stood firmly at his side when war broke out with the Teutonic Order of Prussia and Vytautas with Jogaila dealt the Teutonic Knights a mortal blow in the battle of Žalgiris (Tannenberg) in 1410. Ona died in 1418, without seeing the day the Holy Roman Emperor granted her husband a royal crown. In the chronicles of the Teutonic Knights Ona is described as “The most elegant woman in Europe.”

Vytautas’ daughter Sofia is shown with husband Vasily, Grand Duke of Moscovia, in
an old woodcut.

The only daughter of Vytautas and Ona was Sofia, an energetic and strong-willed woman, who married the Grand Duke of Moscow. Though living in an alien environment where women were traditionally kept in the terema, the Muscovite equivalent of the oriental harem, Sofia did not accept this strange custom. She was not a slave to her husband, but actively engaged in the politics of the Kremlin. After her husband died she doggedly fought for her son’s rights to the throne. While her father Vytautas was alive, she felt secure, seeking his protection over her family. After his death she continued her firm rule in the Kremlin, although she was driven from the throne and even imprisoned.

She ultimately regained the throne for her son, chose a wife for him, and defended Moscow against the inroads of the Tartars. When Jogaila became the king of Poland, ushering in the renowned Jagelonian Dynasty, his sister Aleksandra exercised great influence in Polish politics. Aleksandra had married the Duke of Mazovia. She went down in posterity as cofounder, with Jogaila, of the University of Cracow. Her capable daughter was to be the mother of the Habsburg Emperor, Frederick IV. The fourth wife of Jogaila was a Lithuanian, Sofia, Duchess of Alšenai. She was the first queen of Poland to see to it that her subjects had the Holy Scriptures in their native language. She played a prominent role in having her offspring chosen as rulers of Poland and Lithuania.

From the fourteenth to the middle of the sixteenth century, a heated conflict between the Lithuanians and the Poles raged over the political union of the two states. The Lithuanians sought to break the ties with the Poles, while the latter wanted a closer union. These strained relations can be seen in the fate of Duchess Barbora Radvila, whose brother and cousin were high dignitaries of Lithuania.

Vytautas’ wife Ona, as painted by Kazys Šimonis.

Duchess Barbora was a ravishing beauty and a true child of the epoch of humanism and the Renaissance. Her love affair with Lithuania’s Grand Duke Žygimantas (Sigismund August) led to a stormy episode in Polish-Lithuanian history. The ruler’s mother and the Polish nobles were opposed to the marriage of the heir to the Polish throne to the daughter of Lithuania’s most influential family. “I would rather see in Cracow the Turkish Sultan than see her as queen of Poland,” said many a Polish magnate. Conventions and parliamentary assemblies discussed the question of the ruler’s wedding. After days of waiting, fear, and insults, the young couple married in secret. Finally, the vacillating Sigismund August became king of Poland and had Barbora crowned queen. But their joy was short-lived. Weakened by a long illness (it is said that the dowager queen Bona poisoned her), Queen Barbora died, a victim of the quarrels between the Lithuanian and Polish nobility.

Among the leading lights of the Renaissance period in Lithuania is the personality of Sofia Vnucka Morkus, a wealthy estate owner and an advocate of Calvinism and secular education. Her contemporary was Sofia Chodkevicius (Katkus), who exerted an influence on the illustrious hetman (military marshal) Jonas Karolis Chodkevicius (Katkus). She was an independent woman, who managed vast estates and built churches and monasteries. One of the most educated and influential women of the eighteenth century in Lithuania was Zabiela-Kosakauskas. The list could be expanded indefinitely.

DURING THE ECLIPSE OF LITHUANIAN LIBERTY

From 1795 to 1918 was a long and difficult period that followed Imperial Russia’s annexation of Lithuania. During those years the Lithuanians repeatedly rose against the czarist despotism, women joining their men folk in the struggle to restore the nation’s freedom and independence. In the 1831 rebellion, Countess Emilija Plateris, a patriotic Samogitian girl, distinguished herself as a guerilla colonel and died from wounds received in combat. Two other Samogitian noblewomen, Marija Asanavicius and Antuane t e Tamašauskas, who gained recognition for their great courage on the battlefield, were fortunate to survive, but were obliged to leave the country and, fearing Russian persecution, did not return.

Queen and Grand Duchess Barbora.

In the same 1831 uprising Princess Kunigunda Oginskis achieved distinction for her heroic devotion as a nurse to the wounded rebels. With her husband, General Gabrielius Oginskis, who had led the Lithuanian units during Napoleon’s march on Moscow in 1812 and who was now Vice-President of Lithuania’s temporary government, she shared the trials and dangers of underground warfare. After the suppression of the revolt, she and her husband emigrated to France. Later, with the Czar’s permission, they returned to Lithuania. It was her fate, however, to experience the tragic loss of her husband, who was seized and tortured by the Russians and died in a Vilnius prison.
The rebellion was suppressed with great bloodshed. The old University of Vilnius, a fountainhead of national thought and aspirations, was closed. Men and women who participated in the rebellion were deported to Siberia. Some succeeded in escaping to the West.

In the 1863 revolt, the sisters of Liudvikas Narbutas, one of the leaders of the revolt— Teodora Monciunskas and Emilija Jucevicius—stand out as women rebels. Teodora supported her brother’s unit as an active liaison runner. Emilija sheltered the units of Ostroga and Lenkevicius. Kazimiera Žebrauskas helped the units of Saurimavicius and Olšauskas in Ukmerge and Panevežys counties. Karolina Gouvaltis residing in Vilnius helped volunteers, hid and clothed rebels.

Women also gave food, shelter, and other aid to the families of men who joined the revolt. Many women were subjected to punishment because their men were in rebel ranks. Without doubt, Dominika Dalevskis, a widow in Vilnius, suffered the most. Her son Titas was executed in Vilnius. Another son, Pranciškus, received a twentyyear hard labor sentence. Konstantinas migrated to France. Aleksandras, returning from Siberia, died in Vilnius before the revolt. Mrs. Dalevskis and her six daughters were deported to the depths of Russia. Banishing her to Ufa province, Governor General Muraviev declared: “Let this mother, who has nurtured so many mutineers, settle near the road to the penal camps. Let her observe her sons, relatives and friends being driven along this road in chains.” On this road Mrs. Dalevskis saw Pranciškus being taken to Siberian exile. The son, as told by Apolonija Sierakauskas— another woman in exile who witnessed the meeting—fell at his mother’s feet, while she only pressed his head to her breast, without a sob or a tear.

Countess Emilija Plateris

Russian gendarmes sent hundreds of rebels to the gallows, Thousands were deported to desolate wastelands of Russia. All Lithuanian schools were closed. Obscurantism clouded the horizon. In 1864 the Lithuanian language was banned in all public offices, and the use of Latin characters in Lithuanian publications was prohibited.

The reactionary czarist regime in Lithuania began a policy against the Catholic Church. This was coupled with Russification and colonization of sequestrated lands by Russian settlers. Dark days had indeed descended upon Lithuania.

During the struggle against Russia, Lithuania lost many of her notables and intellectuals. The only positive development was the abolition of serfdom in 1861, which permitted the sending of peasant children to school. As a consequence, a generation of intellectuals of peasant background sprang up, which took up the struggle for the peasantry and for the nation as a whole. They were, without doubt, the prototypes of the Lithuanian youth a century later that rose up to wage open and guerilla warfare against the overwhelming forces of the Russian Soviets, who had occupied their country and had deported countless thousands of their relatives and neighbors to the barren reaches of Siberia.

In the struggle with the czarist government, women were active participants—not as wives of kings and dukes, but as peasant women. During and after the period of serfdom it was the Lithuanian peasant women who did so much to preserve their ancient language. Seated at her spinning wheel, the Lithuanian mother taught her children to read in the native language. She told them stories and legends about the country’s great past when the land was free and powerful. These legends survived, being passed on from generation to generation. The Lithuanian woman knew that she would be punished for this, but her love of her country was stronger than her fear of punishment.

A Lithuanian peasant woman washing linen in a brook. (Turn of the century photograph.)

The Lithuanian woman was brave. When the Russian authorities ordered the church at Kražiai in 1893 shut down to prevent the people from praying in Lithuanian, the women would not abandon this sanctuary. Thereupon the Russian gendarmes broke in among the worshipers and hacked them with their swords. But the Lithuanian woman bravely and patiently bore her suffering. It was her way of protesting against the regime for forbidding the worship of God in her own language.

The political maturity of the woman runs like an unbroken thread throughout Lithuanian history. Women were among the devoted book smugglers who clandestinely brought into the country Lithuanian books and newspapers, printed in East Prussia and the United States, and distributed them among the common folk hungry for the forbidden Lithuanian word. For their patriotic work many of these book carriers were arrested and banished to Siberia. Among the most prominent women who directed book smuggling from Tilže (East Prussia) was Morta Zaunius, who later helped to organize the Lithuanian exhibit at the World’s Fair in Paris in 1901.

In 1883 the fledgling Lithuanian newspaper Aušra formulated the national aspirations, demanding reestablishment of the Lithuanian press and the opening of more schools. By 1889 another Lithuanian newspaper, Varpas, was asking for acknowledgment of national rights, land reform, civil rights for all, and ultimately national independence.

After years of constant struggle, the Lithuanian press was finally restored in 1904.

The 1905 revolution in Czarist Russia had repercussions in Lithuania. Uprisings broke out all over the country, and regional functionaries of Russia were swept aside in the rural areas. On September 22-23, 1905, the Alliance of Women of Lithuania was formed. The goal of the country’s first women’s organization was the restoration of the Lithuanian State and securing of women’s rights. (Russian law accorded very limited rights to women, especially in the field of inheritance).

That same year a Lithuanian Conference was called in Vilnius. It was attended by two thousand delegates. Women actively participated in the work of this conference. Its resolutions demanding human and political rights for Lithuania later circulated throughout the country. Gabriele Petkevicius, Felicija Bortkevicius, Ona Šapkauskas, Katre Jane lis, and Ona B raza us kas were among the vocal women at the conference.

This sculpture by Petras Rimša, showing a mother at a spinning wheel teaching her child to read during the “Press Ban” in 19th century Lithuania, personifies the indomitable spirit of the Lithuanian woman.

At the end of 1905 a meeting of peasant women took place at Lotove- nai, in Šiauliai County. The women declared that they must have equal rights with men. Being subject to the same taxes, they argued, their rights should also be the same. They also demanded Lithuanian language schools, protested against unrestricted sale of liquor, and came out in favor of a strong, nationwide women’s society.

Growing czarist reaction, however, ruined their hopes. The reprisals were similar to those that took place after the 1831 and the 1863 revolts. Again many Lithuanian patriots were banished to Siberia, while others managed to escape to western Europe and America. Among the emigrants to America were young men fleeing from service in the Czar’s army. Lithuanian women sent their sons abroad that they may escape doing military duty in the Caucasus, Turkestan, and Far Siberia.

In 1907 the first Women’s Conference took place in Kaunas. Because of possible political reaction, the women had to formulate their demands carefully. The conference, with Gabriele Petkevicius as chairman and Ona Pleiris-Puida as secretary, saw a need for a general women’s organization. The meeting raised the question of women’s rights, suggested that women also organize by profession, concern themselves with education, and protest against the government’s open sale of liquor.

In 1908 two women’s organizations were founded—the Lithuanian Catholic Women’s Society in Kaunas and the Lithuanian Women’s Association in Vilnius.

Prior to the First World War, the national political work of women was clandestine. Women often engaged in underground party activities. They peasant women took place at Lotove- nai, in Šiauliai County. The women declared that they must have equal rights with men. Being subject to the same taxes, they argued, their rights should also be the same. They also demanded Lithuanian language schools, protested against unrestricted sale of liquor, and came out in favor of a strong, nationwide women’s society. Growing czarist reaction, however, ruined their hopes. The reprisals were similar to those that took place after the 1831 and the 1863 revolts. Again many Lithuanian patriots were banThe goal of the country’s first women’s organization was the restoration of the Lithuanian State and securing of women’s rights. ished to Siberia, while others managed to escape to western Europe and America. Among the emigrants to America were young men fleeing from service in the Czar’s army. Lithuanian women sent their sons abroad that they may escape doing military duty in the Caucasus, Turkestan, and Far Siberia. In 1907 the first Women’s Conference took place in Kaunas. Because of possible political reaction, the women had to formulate their demands carefully. The conference, with Gabriele Petkevicius as chairman and Ona Pleiris-Puida as secretary, saw a need for a general women’s organization. The meeting raised the question of women’s rights, suggested that women also organize by profession, concern themselves with education, and protest against the government’s open sale of liquor. In 1908 two women’s organizations were founded—the Lithuanian Catholic Women’s Society in Kaunas and the Lithuanian Women’s Association in Vilnius. Prior to the First World War, the national political work of women was clandestine. Women often engaged in underground party activities. They Year o f the Lith u a n ia n Bo o k helped liberate political prisoners and arranged their escape abroad. They edited clandestine and public newspapers and wrote articles on women’s rights. They were often under police surveillance.

When the Kaiser’s armies occupied Lithuania in 1915 and the retreating Russians transported part of the population to Russia Proper, Lithuanian women faced adversity with patience and fortitude. With the fall of the Russian colossus during the March 1917 revolution, Lithuanian women in Russia organized in groups, in order to speed up their return to their homeland. In Moscow they formed the Lithuanian Women’s Freedom Union, with Ona Mašiotas as its suffragette-type chairman.

During the Lithuanian Conference in Petrograd (St. Petersburg) in May of 1917, the women participants—among them: Felicia Bortkevicius, Liuda Purenas, Birute Grigaitis, and Emilija Spudas-Gvildys —insisted that the assembly extend equal rights to women, and their demand was accepted in resolution form. During the German occupation, the Vilnius-based Committee to Aid War Victims was for a long time the only official Lithuanian institution. Two of its more active members were Emilija Vileišis and Sofia Smetona.

On February 16, 1918, Lithuania declared her independence. Even before the impending collapse of Imperial Germany, many refugees had started on their return journey from Russia. The Lithuanian women were going back to rebuild their homeland.

Jadvyga Chodakauskas was among the first women to be sent abroad. In 1918 she headed the Lithuanian Information Center in Bern, Switzerland. For a while she was the representative of Lithuania in Switzerland. In 1919 she went to Paris with the Lithuanian Peace Delegation as the Director of the Lithuanian Information Center.

• This article was adapted from The Lithuanian Woman, edited by Birute Novickis and published by the Federation of Lithuanian Women’s Clubs, Brooklyn, 1968


LRT FACTS. Are Lithuanian cities 'deadliest' in Europe and is drinking to blame?

Fox News ranked Kaunas, VIlnius and Klaipėda as the top three “deadliest” European cities, basing their claim on a UN study from 2019.

Once the story was picked up by all major news outlets in Lithuania, social media exploded with comments, the police held a press conference disputing the “deadliest” label, and government representatives claimed to have contacted Fox News for clarification.

Did Fox truthfully present the figures from the UN Global Study on Homicide, and does Lithuania indeed have the “deadliest” cities in Europe? And why did the deputy police commissioner say it’s enough for Lithuanians to “drink less” for the problem to be solved?

Safe streets, dangerous homes

The Lithuanian police hosted a dedicated conference to present its own statistics – they said most homicides in Lithuania are domestic, therefore Lithuanian cities cannot be seen as dangerous.

The police representatives also said the UN data of the number of homicides per 100,000 people wasn’t up to date.

“The difference is that the domestic crimes, in essence, do not cause danger to the society, to other residents,” the head of communications at the Lithuanian police, Ramūnas Matonis, told LRT FACTS.

“Two people drink, get drunk, get into a fight, use a knife or something, and that’s it. Of course, every murder is a tragedy, but it’s not right to scare people that Lithuanian cities are unsafe,” he added.

The publication by Fox News was disingenuous, said the police.

Researcher Maryja Šupa from the Criminology Department of Vilnius University (VU) said most crimes in Lithuania are committed in domestic environment.

“It’s important to note that no single figure – like the number of murders per 100,000 people – can tell if a city is safe,” she told LRT FACTS, adding it was necessary to look at contextual factors.

Seventy percent of homicides in Lithuania happen in the homes of the victims or the accused, according to an investigation by VU researchers. A completely unrelated person is the victim of murder only in 20 percent of cases.

“Although the number of murders [in Lithuania] is relatively high in comparison with other EU states, only a minority of the murders happen in public spaces,” said Šupa, adding it would be “completely wrong” to say that a random person faces any real risk of being attacked and killed on the streets.

The safety of a city depends on various factors, she said, including “subjective safety – how secure people feel regardless of criminal statistics.”

Therefore, the Fox News “dealiest cities” headline “says very little about the cities themselves,” as it avoids saying “who exactly, why and under what circumstances has died,” said Šupa.

And although Lithuania has the highest number of homicides in the EU, “the statistics are more than 10 times higher in North and South America,” where crime is often linked with drug trade and organised crime, she said.

Lithuania's culture of violence and social exclusion

During the police press conference on February 6, Deputy Police Commissioner Edvardas Šileris said Lithuanians “should drink less” when asked what could help solve the problem of murders.

According to the VU criminologist Šupa, murders committed at home “do not pose a direct threat to the public,” but are "often connected with alcohol [abuse], as 70 percent of murders were committed under the influence of alcohol".

This shows "a culture of violence [that is] a problem common in the whole post-Soviet [sphere]”.

“In countries where alcohol is used in public – in cafes, bars, other spaces – there is more social control, more safeguards, other people that can notice a conflict situation and intervene before something happens.”

Meanwhile, closing oneself up in domestic environments is common in post-Soviet countries, she said.

Crime often results from social exclusion, many of the accused tend to have only school-level education, some have committed other crimes before, and at least 40 percent have previously been imprisoned, added Šupa.

“And it’s again a question for us, the society – is there really no direct danger to people in the streets, does it mean that everything is alright?”

Official but inconsistent data

In a Facebook post, political scientists Mažvydas Jastramskis has criticised the ranking of cities based on statistics from a single year. He said he made several calculations himself which, depending on criteria, completely change the “deadliest” list.

“One of the statistics’ [. ] principles is that you cannot take one measure and present it as if it reflects the entirety,” he wrote.

Jastramskis proceeded to use the UN database to take data from 2011 through 2016, which showed statistics from cities in “almost all European nations, except Kyiv and Dublin”.

The information surprised Jastamskis.

“For example, the deadliest European city isn’t Moscow or Kaunas, but Cahul” in Moldova, he wrote.

When he adjusted the filter to include cities with at least two data entries, the top 10 he got were “Bijelo Polje (Montenegro), Kasnodar (Russia), Prešov (Slovakia), Klaipėda, Kaunas, Vilnius (Lithuania), Moscow (Russia), Riga (Latvia), Liepāja (Latvija), Schaan (Lichtenstein),” according to Jastamskis.

When measuring statistics per 100,000 people, all it takes is for one small town to have a single murder for the statistics to inflate, he wrote.

“This happened with Schaan in Liechtenstein, where one banker was killed in 2014. For a town of 6,000 people this meant 16.9 murders per 100,000 people.”

Comments on social media also pointed to the fact that the quoted statistics are from 2016 and are therefore outdated.

According to Statistics Lithuania, the number of murders in the country have been steadily decreasing for a long time.

The UN report does not rank cities, but profile different countries based on regional and year-frame filters.

“The United Nations Office on Drugs and Crime seeks to shed light on different phenomena, from lethal gang violence and the role of firearms to links with inequalities and gender-related killings, and in this way support targeted action,” Yury Fedotov, head of the UN Office on Drugs and Crime, is quoted in the report.

“I hope that the research and analysis contained in the study are used in this spirit – not to designate “murder capitals” but to learn, understand and strengthen prevention.”

The report did not analyse statistics of different cities, which can only be found in a separate UN database.

Fox News ended up using the statistics differently than intended by the UN and presented them as a rating of “deadliest” cities, contrary to what the report aimed to do.

Verdict: manipulation / sensational headline

Although Lithuania definitely stands out among EU member states with a high number of murders, it isn’t accurate to say that the country’s cities are unsafe or “deadly”, as Fox News claimed. Based on Lithuania’s crime statistics, most murders happen in domestic environments and not in the pubic. Critics said it was wrong to analyse the UN data in the way Fox News did, basing the story on a single criterion of murders per 100,000 inhabitants. Experts, however, said that although the data was inconsistent, it still showed problems arising from social exclusion.


Lithuania News - History

Lithuanian Jewish leaders on Tuesday accused Russian President Vladimir Putin of "falsifying" history after he defended the Soviet annexation of the Baltic states during World War II.

While paying tribute to those who perished fighting the Nazis, the Jewish community dismissed Putin's attempt to play down Soviet crimes in Lithuania and fellow Baltic states Latvia and Estonia.

"We, the descendants of the Jews of Lithuania, oppose this falsification of the history of the enslavement of our independent Lithuania," community leader Faina Kukliansky and lawmaker Emanuelis Zingeris said.

They issued a joint statement in response to Putin's article in US magazine The National Interest earlier this month in which he described the Baltic states' annexation as "incorporation".

"Their accession to the USSR was implemented on a contractual basis, with the consent of the elected authorities," Putin wrote, saying it was in "line with international and state law of that time".

Putin has repeatedly accused the West of playing down the Soviet contribution to the Nazi defeat -- an estimated 27 million Soviet troops and civilians were killed in World War II.

But for many in the Baltic states, which were independent states after World War I, the Soviet takeover marked the start of decades of often brutal Soviet occupation rather than liberation.

"Lithuanian Jews who had a guarantee of ethnic continuity in independent Lithuania became the ethnic group most persecuted by the Soviet occupiers," Jewish leaders said.

"The majority of Lithuania's Jews didn't want a Soviet government. The massive fight later by the Soviet Union and its satellites against Zionism became the hallmark of the entire period of Communist rule."

The Soviets invaded the Baltic states in 1940 under their infamous Molotov-Ribbentrop pact with Nazi Germany. A year later, in June, they deported some 43,000 Baltic citizens, including thousands of Jews.

That drive was cut short when Germany turned on its former allies the same month, pushing the Red Army out of the Baltic region as it invaded the Soviet Union.

In 1944-45, the Soviets put an end to the Nazi occupation -- during which almost all of the region's Jews were killed -- heralding the renewed deportations of hundreds of thousands and prompting an armed resistance that only ended in 1953.

Moscow refuses to recognize the Soviet takeover of the Baltic states as an occupation and it has never offered an apology or reparations.

It was only in March 1990 that Lithuania became the first Soviet republic to declare independence, before joining the European Union and NATO in 2004.


लिथुआनिया

Lithuania is the southernmost of the Baltic states. During the Holocaust, the Germans murdered about 90 percent of Lithuanian Jews, one of the highest victim rates in Europe.

महत्वपूर्ण तथ्यों

Lithuanians carried out violent riots against the Jews both shortly before and immediately after the arrival of German forces.

In June and July 1941, detachments of German Einsatzgrupen together with Lithuanian auxiliaries, began murdering the Jews of Lithuania.

By the end of August 1941, most Jews in rural Lithuania had been shot. By November 1941, the Germans had also massacred most of the Jews who had been concentrated in ghettos in the larger cities.

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Lithuania is the southernmost of the Baltic states.

The Jews of Lithuania had their own distinct and highly developed Jewish culture, including a special dialect of the Yiddish language. Lithuanian Jewry played a profound role in many Jewish ideologies, including the Jewish workers' movement, Zionism, and rational religious thought. Before World War II, the Lithuanian Jewish population was some 160,000, about 7 percent of the total population.

Lithuania was an independent country from the end of World War I until 1940. In March 1939, Nazi Germany delivered an ultimatum to Lithuania to cede the territory of Memel (Klaipeda), a region with an ethnic German majority, to the Reich. On March 21, the Lithuanian government agreed to the German terms. The following day the German and Lithuanian foreign ministers signed a treaty that returned the Memel territory back to Germany and included an non-aggression pact between the two parties. The Soviet Union occupied Lithuania in June 1940 and annexed the country in August 1940. By 1941, the Jewish population of Lithuania swelled by an influx of refugees from German-occupied Poland to reach about 250,000, or 10 percent of the population.

In June and July 1941, following the German invasion of the Soviet Union, the Germans occupied Lithuania. During the German occupation, Lithuania was incorporated into the Reich Commissariat Ostland (Reichskommissariat Ostland), a German civilian administration covering the Baltic states and western Belorussia.

The Lithuanians carried out violent riots against the Jews both shortly before and immediately after the arrival of German forces. In June and July 1941, detachments of German इन्सत्ज़ग्रुपपेन together with Lithuanian auxiliaries, began murdering the Jews of Lithuania. By the end of August 1941, most Jews in rural Lithuania had been shot. By November 1941, the Germans also massacred most of the Jews who had been concentrated in ghettos in the larger cities. The surviving 40,000 Jews were concentrated in the Vilna, Kovno, Siauliai, and Svencionys ghettos, and in various labor camps in Lithuania. Living conditions were miserable, with severe food shortages, outbreaks of disease, and overcrowding

In 1943, the Germans destroyed the Vilna and Svencionys ghettos, and converted the Kovno and Siauliai ghettos into concentration camps. Some 15,000 Lithuanian Jews were deported to labor camps in Latvia and Estonia. About 5,000 Jews were deported to killing centers in German-occupied Poland, where they were murdered. Shortly before withdrawing from Lithuania in the fall of 1944, the Germans deported about 10,000 Jews from Kovno and Siauliai to concentration camps in Germany.

Soviet troops reoccupied Lithuania in the summer of 1944. In the previous three years, the Germans had murdered about 90 percent of Lithuanian Jews, one of the highest victim rates in Europe.


Lithuania marks 80th anniversary of Soviet mass deportations

Copyright 2021 The Associated Press. सर्वाधिकार सुरक्षित।

A man lays flowers on rusty railway tracks near old wagons at the Naujoji Vilnia railway station in Vilnius, Lithuania, Monday, June 14, 2021, as Lithuania marked the mass deportation 80 years ago by the Soviet Union that was occupying the Baltic nation. Deportation started on June 14, 1941, where some 280,000 people were deported to Siberian gulags, a year after Soviet troops had occupied Lithuania. (AP Photo/Mindaugas Kulbis)

VILNIUS – Flowers were laid on rusty railway tracks Monday as Lithuania marked the start of a mass deportation 80 years ago by the Soviet Union that was occupying the Baltic nation.

People who were considered opposed to Moscow or deemed counter-revolutionary elements were sent to Siberia from Lithuania and few returned. Others who owned land or houses were evicted and sent there too.

Some 280,000 people were eventually deported to the Siberian gulags, a year after Soviet troops had occupied Lithuania. Many of those sent away never returned from the long journey in the cattle wagons.

“Two evil forces — Nazi Germany and the Soviet Communist regime — had entered a secret agreement to divide Europe,” President Gitanas Nauseda said during a solemn ceremony in Vilnius, on a day considered one of the darkest pages in the Baltic nation’s recent history. These “regimes caused unspeakable pain and suffering.”

One of those attending the ceremony Monday was deported and spent almost 11 years in Siberia. Aurelija Staponkute and her family were deported only because they had a small farm that was seized.

“We do not know what the future might bring. Whatever happens, we must protect our freedom. After all, we fought for it so hard,” the 83-year-old said.

Only one-third of those deported ever returned, according to historians, and the mass deportation affected all walks of life in the Baltic nation, where it's considered a genocide by an occupying power.

The Soviet occupation of Lithuania lasted for five decades. After regaining its independence in 1991, Lithuania joined the European Union and NATO in 2004.

Copyright 2021 The Associated Press. सर्वाधिकार सुरक्षित। This material may not be published, broadcast, rewritten or redistributed without permission.


Lithuania marks 80th anniversary of Soviet mass deportations

Lithuania Deportations Anniversary A man lays flowers on rusty railway tracks near old wagons at the Naujoji Vilnia railway station in Vilnius, Lithuania, Monday, June 14, 2021, as Lithuania marked the mass deportation 80 years ago by the Soviet Union that was occupying the Baltic nation. Deportation started on June 14, 1941, where some 280,000 people were deported to Siberian gulags, a year after Soviet troops had occupied Lithuania. (AP Photo/Mindaugas Kulbis) (Mindaugas Kulbis)

June 14, 2021 at 12:01 pm EDT

VILNIUS, Lithuania &mdash (AP) — Flowers were laid on rusty railway tracks Monday as Lithuania marked the start of a mass deportation 80 years ago by the Soviet Union that was occupying the Baltic nation.

People who were considered opposed to Moscow or deemed counter-revolutionary elements were sent to Siberia from Lithuania and few returned. Others who owned land or houses were evicted and sent there too.

Some 280,000 people were eventually deported to the Siberian gulags, a year after Soviet troops had occupied Lithuania. Many of those sent away never returned from the long journey in the cattle wagons.

“Two evil forces — Nazi Germany and the Soviet Communist regime — had entered a secret agreement to divide Europe,” President Gitanas Nauseda said during a solemn ceremony in Vilnius, on a day considered one of the darkest pages in the Baltic nation’s recent history. These “regimes caused unspeakable pain and suffering.”

One of those attending the ceremony Monday was deported and spent almost 11 years in Siberia. Aurelija Staponkute and her family were deported only because they had a small farm that was seized.

“We do not know what the future might bring. Whatever happens, we must protect our freedom. After all, we fought for it so hard,” the 83-year-old said.

Only one-third of those deported ever returned, according to historians, and the mass deportation affected all walks of life in the Baltic nation, where it's considered a genocide by an occupying power.

The Soviet occupation of Lithuania lasted for five decades. After regaining its independence in 1991, Lithuania joined the European Union and NATO in 2004.

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